कांग्रेस के डाटा एनालिसिस्ट विभाग के हेड ने उठाए पुरानी पेंशन व्यवस्था पर सवाल

नई दिल्ली- देश में चुनावी माहौल के बीच कई वादे और मुद्दे सामने आ रहे हैं. पुरानी पेंशन स्कीम का मामला भी हिमाचल प्रदेश से लेकर गुजरात चुनाव में गरमाया हुआ है. कांग्रेस पुरानी पेंशन लागू करने का वादा कर रही है. इसके साथ ही कई राज्यों में इस पेंशन स्कीम को फिर से लागू किए जाने की मांग उठ रही है. इसी बीच कांग्रेस के डाटा एनालिटिक्स डिपार्टमेंट के हेड प्रवीण चक्रवर्ती ने पुरानी पेंशन व्यवस्था के नुकसान को समझाया है.

प्रवीण चक्रवर्ती ने ट्वीट करते हुए कहा कि गुजरात में 6.5 करोड़ (65 मिलियन) लोगों में से लगभग 3 लाख लोग सरकारी सेवा में हैं और पुरानी पेंशन योजना पर सरकार का कर राजस्व का लगभग 15% खर्च होगा. उन्होंने सवाल किया है कि 0.5% लोगों को रिटार्यमेंट के बाद पेंशन के रूप में सभी करदाताओं के पैसे का 15% क्यों मिलना चाहिए?

बता दें कि गुजरात विधानसभा चुनाव में पुरानी पेंशन योजना एक बड़ा मुद्दा बना हुआ है जिसकी बहाली को लेकर लगातार मांग की जा रही है. कांग्रेस ने गुजरात विधानसभा चुनाव जीतने के बाद पुरानी पेंशन स्कीम को फिर से लागू करने का वादा किया है. राज्य में सरकारी कर्मचारियों की कुल संख्या करीब 10 लाख है. ये एक बड़ी संख्या है जिसका समर्थन पाने के लिए सभी राजनीतिक दल कोशिश कर रहे हैं.

क्या है पुरानी पेंशन स्कीम ?
पुरानी पेंशन स्कीम में कर्मचारियों को रिटायरमेंट के बाद एक फंड दिया जाता है. पुरानी पेंशन स्कीम जिसको साल 2003 में वाजपेयी सरकार ने खत्म कर दिया था. जिसके बाद 1 अप्रैल 2004 से इस पुरानी पेंशन स्कीम के बदले राष्ट्रीय पेंशन स्कीम को लागू किया गया.

पुरानी पेंशन स्कीम में सरकारी कर्मचारी के रिटायरमेंट के बाद उसकी सैलरी का 50 फीसदी और मंहगाई भत्ता या नौकरी के आखिरी 10 महीनों की सैलरी पेंशन के रूप में दी जाती थी. पुरानी पेंशन स्कीम में रिटायरमेंट के बाद कर्मचारी की पेंशन अंतिम बैसिक सैलरी और मंहगाई दर के आधार पर तय की जाती थी. इतना ही नहीं इस स्कीम में रिटायरमेंट के बाद कर्मचारी को मिलने वाली पेंशन के लिए उसकी सैलरी में से किसी तरीके की कोई कटौती नहीं की जाती थी.

हालांकि कर्मचारी को 10 साल तक काम करना अनिवार्य होता था. पुरानी पेंशन स्कीम में कर्मचारी की ग्रेच्युटी की रकम 20 लाख रूपये तक तय थी,जो कर्मचारी को रिटायरमेंट के दौरान मिलती थी. इसके साथ ही इस स्कीम में कर्मचारियों को पेंशन सरकार की ट्रेजरी या राजकोष से दी जाती थी.

नौकरी के दौरान कर्मचारी की मृत्यु होने पर पेंशन उसके परिवार को मिलती थी. इस स्कीम में जनरल प्राविडेंट फंड GPF भी दिया जाता था. इसमें हर 6 महीने बाद महंगाई भत्ते को भी जोड़ा जाता था जिसे वेतन आयोग लागू करता था. जिससे कर्मचारी की पेंशन भी समय-समय पर बढ़ती रहती थी.

नई पेंशन स्कीम NPS क्या है?
इस स्कीम को 1 अप्रैल 2004 एनडीए सरकार ने लागू किया. इस स्कीम के तहत कर्मचारी को रिटायरमेंट के बाद मिलने वाली पेंशन के रूप में वो रकम दी जाती है जो उसकी नौकरी के दौरान जमा होती है. यानि की नौकरी करते समय कर्मचारी की बैसिक सैलरी से 10 फीसदी की कटौती होती है और 14 फीसदी योगदान राज्य सरकार की ओर से दिया जाता है. ये पूरी रकम पेंशन रेगुलेटर PFRDA के पास जमा होती रहती है. और रिटायमेंट के दौरान कर्मचारी को पेंशन के रूप में दी जाती है.

नई पेंशन स्कीम के तहत कर्मचारी अपनी रकम को निवेश भी कर सकते हैं और रिटायरमेंट के बाद पेंशन राशि का एक हिस्सा निकाल भी सकते हैं. इसमें किसी कर्मचारी किसी को भी नॉमिनी बना सकता है, और यदि नौकरी के दौरान कर्मचारी की मृत्यु हो जाती है तो उसका सारा पैसा नॉमिनी को मिल जाता है.

इसके साथ ही न्यू पेंशन स्कीम में जनरल प्रोविडंट फंड नहीं दिया जाता,जबकि पुरानी स्कीम में ये सुविधा थी. नई स्कीम में कर्मचारी को भुगतान शेयर बाजार की चाल के आधार पर किया जाता है और इसमें रिटायरमेंट के बाद कोई निश्चित रकम नहीं मिलती.

साथ ही इस स्कीम में कर्मचारी के लिए ग्रेच्युटी का भी कोई स्थायी प्रावधान नहीं हैं. इसमें यदि कर्मचारी की मृत्यु हो जाती है तो परिवार को पेंशन मिलती है लेकिन योजना में जमा रकम को सरकार जब्त कर लेती है.

इसके साथ ही पुरानी पेंशन स्कीम में मिलने वाले जीपीएफ के ब्याज पर कोई इनकम टैक्स नहीं देना होता, लेकिन न्यू पेंशन स्कीम में शेयर बाजार के आधार पर आखिर में जो रकम मिलेगी उस पर टैक्स देना होगा.

दोनों स्कीमों में इन अंतरों को लेकर तमाम राज्यों में कर्मचारी पुरानी पेंशन को बहाल करने की मांग कर रहे हैं. इसको लेकर राष्ट्रीय स्तर पर अभियान चलाया जा रहा है. नेशनल मूवमेंट फॉर ओल्ड पेंशन स्कीम NMOPS का कहना है कि नई पेंशन स्कीम में फायदे नहीं है. कर्मचारियों के लिए रिटायरमेंट के बाद अच्छी पेंशन की सुविधा नहीं हैं.

कर्मचारियों का कहना है कि इससे अलग-अलग सरकारी सेक्टर में काम करने वाले कर्मचारियों के लिए आर्थिक तौर पर सुरक्षा नहीं है.

इन सभी बातों को लेकर कर्मचारी पुरानी पेंशन को लागू करने की मांग कर रहे हैं. ऐसे में इस विरोध को राजनीतिक पार्टियां चुनावी माहौल में भुनाने का काम कर रही हैं. हिमाचल के बाद गुजरात विधानसभा चुनाव में सत्ता में आने पर आम आदमी पार्टी के साथ-साथ कांग्रेस ने पुरानी पेंशन स्कीम को लागू करने का वादा किया है. जिससे की चुनाव में पार्टियों को उन लाखों सरकारी कर्मचारियों का साथ मिल सके जो इस पुरानी स्कीम को बहाल करने की मांग कर रहे हैं.

हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस ने पुरानी पेंशन के मुद्दे को जोर शोर से उठाया. कांग्रेस की तरफ से प्रियंका गांधी वाड्रा ने हिमाचल में अपनी चुनावी रैलियों में वादा किया है कि यदि राज्य में कांग्रेस की सरकार आती है तो वो पुरानी पेंशन स्कीम को बहाल करेंगे.

पार्टी के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी की तरफ से भी पुरानी पेंशन स्कीम के समर्थन को लेकर कई बार खुलकर बात की गई. राहुल गांधी ने सोशल मीडिया के जरिए इसका समर्थन भी किया. इसके इलावा कांग्रेस राजस्थान और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में भी इस स्कीम की बहाली को लेकर वादा कर चुकी है.

लेकिन इसी बीच कांग्रेस के डाटा एनालिटिक्स डिपार्टमेंट के हेड प्रवीण चक्रवर्ती ने पुरानी पेंशन स्कीम के नुकसान गिना दिए हैं. प्रवीण चक्रवर्ती ने ट्वीट करते हुए कहा है कि इस पुरानी पेंशन स्कीम के जरिए सरकार को राजस्व से 15 फीसदी का खर्च होगा. ऐसे में राज्य के 0.5 फीसदी सेवानिवृत कर्मचारियों को पेंशन के रूप में आखिर राज्य के कर्मचारियों का 15 फीसदी टैक्स का पैसा क्यों दिया जाना चाहिए.

इतना ही नहीं उन्होंने अपने इस दावे को लेकर नीति आयोग के पूर्व वाइस चैयरमेन अरविंद पणगरिया के एक इंटरव्यू को भी साझा किया है जिसमें वो पुरानी पेंशन स्कीम को लागू करना एक गलत कदम बता रहे हैं.

अब गुजरात विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस के वरिष्ठ नेता की तरफ से किए गए इस दावें को लेकर शायद कांग्रेस को नुकसान उठाना पड़ सकता हैं, वहीं दूसरी तरफ बीजेपी इसे भुनाने की कोशिश भी कर सकती है.