एक दूसरे के प्रशंसक थे सावरकर और कांग्रेस, फिर कैसे हुई दुश्मनी? जानें…

महाराष्ट्र में विधानसभा चुनावों के दौरान सावरकर लगातार चर्चा में बने हुए हैं. भाजपा ने सावरकर को भारत रत्न घोषित करने का वादा कर दिया है तो कांग्रेस पार्टी इस कदम को चुनावी राजनीति करार दे रही है. इन हालात में यह जानना दिलचस्प हो सकता है कि क्यों और कैसे सावरकर और कांग्रेस के बीच दुश्मनी हुई थी. इस सवाल की जड़ में एक तथ्य ये है कि शुरू से ही ऐसा नहीं था बल्कि सावरकर और कांग्रेस एक दूसरे के प्रशंसक और सहयोगी हुआ करते थे.

हिंदुत्व राष्ट्रवाद के पुरोधा माने जाने वाले सावरकर ने बाल गंगाधर तिलक और नौरोजी ही नहीं बल्कि महात्मा गांधी, पंडित जवाहरलाल नेहरू, सुभाषचंद्र बोस और नरीमन जैसे नेताओं की तारीफ समय-समय पर करते हुए कहा था कि ‘कांग्रेस आज़ादी की मशाल वाहक’ है. दूसरी तरफ, ब्रिटिश सरकार ने काला पानी से सावरकर को छोड़ने से मना किया था तब 1920 में गांधी, वल्लभभाई पटेल और तिलक ने सावरकर को ​बगैर शर्त छोड़ जाने की मांग रखी थी. अब जानें कि ऐसा क्या हुआ कि दोनों एक दूसरे के विरोधी होते चले गए.

सावरकर का एक बयान था वजह

इतिहास की मानें तो नॉर्थ वेस्ट फ्रंटियर प्रॉविन्स में कुछ हिंदू युवतियों के अपहरण के एक मामले ने इतना तूल पकड़ा था कि तमाम किस्म की खबरें आ रही थीं. एक खबर ये भी थी कि कुछ स्थानीय नेताओं ने अगवा की गई युवतियों को वापस मुस्लिम अपहरणकर्ताओं को सौंपे जाने की मांग की, जिसका कांग्रेस के नेताओं ने अपनी सभा में समर्थन किया. इन खबरों पर प्रतिक्रिया देते हुए महाराष्ट्र के मिरज में एक भाषण में सावरकर ने समर्थन करने वाले कांग्रेसी नेताओं को ‘राष्ट्रीय हिजड़े’ कह दिया. इसके बाद कांग्रेस की नाराज़गी बेहद थी.

बयान के बाद कैसे हुई दुश्मनी?
इस बयान से पहले हुआ ये था कि सावरकर के जेल से रिहा होने को लेकर 1936 में कांग्रेस के कई नेताओं ने कई शहरों में सावरकर के स्वागत में कार्यक्रम रखे थे. सावरकर के इस बयान के बाद ये सारे कार्यक्रम रद्द किए गए. इस पूरे प्रसंग का उल्लेख वैभव पुरंदरे लिखित पुस्तक ‘सावरकर: द ट्रू स्टोरी ऑफ फादर ऑफ हिंदुत्व’ में है, जिसमें कहा गया है कि पुणे में सावरकर के स्वागत कार्यक्रम के प्रभारी कांग्रेसी नेता एनवी गाडगिल ने स्वागत प्रभारी पद छोड़ा और कहा कि सावरकर ने जिस खबर पर कड़ी प्रतिक्रिया दी, वही झूठी थी.

बैकफुट पर गए थे सावरकर?
गाडगिल के इस कदम के बाद सावरकर ने कहा कि अगर खान साहिब के नाम से छपा ये बयान ‘वास्तविक नहीं हुआ तो मुझसे ज़्यादा खुशी किसी और को नहीं होगी’. पुरंदरे लिखते हैं कि सावरकर ने इस मुद्दे पर कई तरह से सफाइयां दीं और कांग्रेस के साथ कई किस्म की बातचीत हुई लेकिन सावरकर को कांग्रेस ने ब्लैकलिस्ट में डाल दिया और आने वाले कुछ समय में सावरकर का जो भी कार्यक्रम होता, वहां कांग्रेसी काले झंडे लेकर विरोध प्रदर्शन करते.

आखिर क्यों दिया था सावरकर ने कड़ा बयान?
वह घटना भी जानिए जिस पर सावरकर ने इतने ‘कड़े शब्दों’ में कांग्रेसी नेताओं की आलोचना कर दी थी. पुरंदरे की किताब की मानें तो जिसे पश्तनूस्तिान बनाने की मांग हो रही थी, उस उत्तर पश्चिम फ्रंटियर इलाके में पहले एक हिंदू लड़की को मुस्लिम समुदाय के लोगों ने अगवा किया. विरोध के बाद लड़की छोड़ दी गई. ऐसे में कुछ मुस्लिम नेताओं ने उस लड़की को मुस्लिमों को वापस किए जाने की मांग की और हिंसा भड़क उठी.

हिंसा के बाद कथित तौर पर कुछ और हिंदू युवतियों को अगवा किया गया. इस पूरे मामले पर मुस्लिमों की हिंसा को ब्रिटिश राज ने कुचला, तो ​फिर ब्रिटिश राज का विरोध हुआ. इस ब्रिटिश कार्यवाही के विरोध में कांग्रेस के नेता भी शामिल रहे. पुरंदरे के मुताबिक नेहरू ने ब्रिटिश एक्शन को ‘साम्राज्यवादी तरीका’ करार दिया था. वहीं सीमांत गांधी खान अब्दुल गफ्फार खान के भाई जफ्फार खान के नाम से ऐसे बयान छपे कि लड़कियां अपहरणकर्ताओं को वापस की जाना चाहिए. ये भी खबरें छपीं कि कांग्रेस के नेताओं ने इस बात का समर्थन किया था. सावरकर ने इन खबरों के आधार पर कांग्रेस के नेताओं को ‘नामर्द’ करार दिया था.

फिर बढ़ती चली गई दुश्मनी
इस पूरे घटनाक्रम के बाद सावरकर और कांग्रेस के बीच फिर कभी नहीं बनी. सावरकर बाबासाहेब आंबेडकर को छोड़ नेहरू, गांधी और सभी प्रमुख कांग्रेसी नेताओं की समय समय पर आलोचना करते रहे. उधर, कांग्रेस भी पूरी ताकत से सावरकर के विरोध में खड़ी हुई और सावरकर को धीरे धीरे भारतीय राजनीति से दरकिनार करती चली गई. एक और किताब की मानें तो सावरकर की 75वीं वर्षगांठ पर हुए कार्यक्रम और उनकी मृत्यु के समय भी कांग्रेस का कोई महत्वपूर्ण नेता शरीक नहीं हुआ था.

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